Monday, December 1, 2014

संस्कृत पाठ्यक्रम में रोचकता का अभाव क्यों है


स्कूल, और यहाँ तक कि विश्वविद्यालयों के संस्कृत पाठ्यक्रम केवल वेद, साहित्य, दर्शन और व्याकरण तक सीमित हैं ।
मुझे संस्कृत में पीएच डी के दौरान सुनने को मिला (पढ़ने को नहीं) जिसका आशय है -
रसायन और धातुओं के संयोग से मित्रावरुण नामक तेज पैदा होता है । उससे पानी फट (भंग हो) जाता है और उससे दो वायु निकलती हैं - प्राण वाहु (आप जानते हैं कौन सी) और उदान वायु (शब्दशः- ऊपर जाने वाली वायु, यह भी आप जानते हैं कौन सी है) । इनमें से उदान वायु का प्रयोग विमान को हल्का करने में किया जाता है । यह किसी कक्षा के पाठ्यक्रम में क्यों नहीं मिला 
उससे पहले कभी बोधायन द्वारा विकर्ण (hypotenuse) की लंबाई ज्ञात करने के तरीके के बारे में पता चला । यह कहीं गणित के पाठ्यक्रम में नहीं मिला । किसी कक्षा के संस्कृत के पाठ्यक्रम में मुझे यह क्यों पढ़ने को नहीं मिला ।
पीएचडी जमा करने के डेढ़ साल बाद मुझे विकीपीडिया पर भास्कराचार्य का उनकी बेटी लीलावती से संवाद अंशतः पढ़ने को मिला । जिसमें उनकी बेटी पूछती है कि पृथ्वी किस चीज पर टिकी हुई है । वे बताते हैं कि किसी चीज़ पर नहीं । पृथ्वी में आकृष्ट-शक्ति है जिसके कारण हर चीज गिरती हुई दिखाई देती है । आकाश में सभी ग्रह बराबर शक्ति से एक दूसरे को खींचते रहते हैं तो भला वे गिरें कैसे? - यह मुझे पीएचडी तक किसी कक्षा के संस्कृत पाठ्यक्रम में पढ़ने को क्यों नहीं मिला ।
उसी संवाद में भास्कराचार्य अपनी बेटी को बताते हैं कि पृथ्वी गोल है । बेटी मान नहीं लेती बल्कि प्रश्न करती है कि कैसे मान लूँ जबकि ऐसा दिखता नहीं है । तो वे उदाहरण देते हैं कि जैसे वृत्त (circle) के सौवें हिस्से को देखा जाए तो सीधा लगता है, वैसे ही पृथ्वी का बहुत छोटा हिस्सा देख पाने के कारण हमें समतल दिखती है । हमने पढ़ा कि कोलंबस को विश्वास था और मैगेलन ने सिद्ध किया कि पृथ्वी गोल है । यह भूगोल के पाठ्यक्रम में पढ़ने को नहीं मिला तो भूगोल के जिम्मेदार जानें पर यह मुझे किसी कक्षा के संस्कृत के पाठ्यक्रम में पढ़ने को क्यों नहीं मिला ।
पीएचडी जमा करके जॉब शुरू करने के कुछ महीनों बाद मुझे महाभारत का उद्धरण पढ़ने को मिला जिसमें पृथ्वी के गोल होने तथा दुनिया के नक्शे के बारे में बताया गया है । मैंने फ़ेसबुक को प्रामाणिक न मानकर वैधता की जाँच की । यह उद्धरण सचमुच महाभारत में हैं । चन्द्रमा में पृथ्वी का प्रतिबिंब होने से असहमत हुआ जा सकता है । उसमें बताया गया है कि जैसे मनुश्य दर्पण में अपना मुख देखता है वैसे पृथ्वी चंद्रमा में (इससे पृथ्वी के गोल होने की जानकारी की पुष्टि होती है) । पृथ्वी के आधे हिस्से में दो पीपल के पत्ते हैं और आधे हिस्से में बड़ा सा खरगोश है । (आधे हिस्से में उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका पीपल के पत्ते के आकार के हैं, बाकी आधे हिस्से में बड़ा सा खरगोश है, यूरोप जिसका सिर है, अफ़्रीका जिसके कान हैं, भारतीय उपमहाद्वीप जिसकी पीठ है और दक्षिण पूर्व एशिया जिसकी पूछ है) (कोष्ठक में लिखी बात महाभारत में नहीं है) । यह मुझे इतिहास और भूगोल के पाठ्यक्रम में नहीं मिला वह अलग बात है, पर यह मुझे किसी कक्षा के संस्कृत के पाठ्यक्रम में पढ़ने को क्यों नहीं मिला ।
अभी कुछ ही महीने पहले विमान-शास्त्र की किसी पुस्तक के एक पृष्ठ पर ’यानस्योपरि सूर्यस्य शक्त्याकर्षण-पञ्जरम्’ पढ़ा । आप समझ सकते हैं कि यह पंजर क्या हो सकता है । आधुनिक सोलर सेल पैनल भी पतली पतली पट्टियों से बनाए जाते हैं, इसी से वोल्टेज बढ़ता है । एक ही खंड होने से वोल्टेज नहीं बढ़ता चाहे जितनी बड़ी पट्टी लगा लें । यह प्रकरण मुझे कहीं संस्कृत के पाठ्यक्रम में पढ़ने को क्यों नहीं मिला ।
हमने कम उमर में ज्योतिष सीखा था तो उसके गणित की गहराई कुछ हद तक पता चली । अंकगणित के साथ रेखागणित और त्रिकोणमिति तो उसमें काफ़ी पहले दिख चुकी थी । पीएचडी जमा करने के सवा साल बाद सी-डैक में एक लेक्चर में सुनने को मिला कि ज्योतिष में कैलकुलस का भी प्रयोग होता है । विचार करके पता चला कि पंचांग में हर दिन ग्रह की स्थिति और गति दी होती है । यह गणना तो कैलकुलस के बिना हो ही नहीं सकती, भले ही उस विधि का नाम कैलकुलस न हो । यह तथ्य मुझे द्वितीय कक्षा से पीएचडी के संस्कृत पाठ्यक्रम में कहीं पढ़ने को क्यों नहीं मिली ।
शायद इसलिए कि पाठ्यक्रम निर्माताओं को या तो यह सब पता ही नहीं था, या लगता था कि बच्चे इसे समझ नहीं पाएँगे । केमिस्ट्री के जटिल केमिकल रिएक्शन पाठ्यक्रम में डालने वालों को तो ऐसी दया नहीं सूझती, क्योंकि वे ज्ञान देना चाहते हैं, तो संस्कृत पाठ्यक्रम बनाने वाले ऐसी दया क्यों दिखाते हैं । क्यों बहुमूल्य ज्ञान की खिड़कियाँ नहीं खोलना चाहते ।

Sunday, March 24, 2013

ये ज़िन्दगी तुम्हारी है


उसके किसी सवाल के जवाब में मैंने कहा
कि हमारे यहाँ शादी के मामले घर के बड़े लोग तय करते हैं
तो उसने कहा कि जिन्दगी आपकी है या पिताजी की
आपको यह जिन्दगी दुबारा तो मिलेगी नहीं
आपको अपनी जिन्दगी के अहम निर्णय खुद लेने चाहिए

वैसे वह सही कह रहा था
मैं भी अक्सर इसी हिसाब से बहुत से काम किए हैं
उनकी इच्छा के विपरीत और बल पूर्वक कही हुई बात के भी विपरीत
आज जनेवि में इसी वजह से हूँ
उनकी इच्छा के विपरीत जनेवि का फ़ार्म डाला
यद्यपि ड्राफ़्ट के रुपये उन्हीं से लिए

पर ....
पर क्या?
थोड़ा लेट हो गए यह कहने में कि यह जिन्दगी हमारी है
मत दखल दो इसमें
जीने दो हमें हमारी तरह
यह थोड़ा पहले कहना चाहिए था

जब
बीए के लिए मेरी कोई महत्त्वाकांक्षा नहीं थी
पर उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रवेश दिलाया
जिसके बिना जनेवि आना असम्भव था
तब कहना चाहिए था यह जिन्दगी हमारी है
मुझे पड़ा रहने दो बिना किसी निश्चय के

जब
पढ़ाई तो ठीक है थोड़ा सोशल होना सीखो
इसके लिए सामान्य सरकारी इंटर कालेज में प्रवेश दिलाया
तब कहना चाहिए था यह जिन्दगी हमारी है
नहीं होना हमें सोशल, हम अकेले रह लेंगे

जब
मैं मृत्यु के बहुत करीब था
वे हमें हर महीने जिला टीबी केन्द्र ले जाते थे
डॉक्टर खान से इलाज करवाने
तब कहना चाहिए था यह जिन्दगी हमारी है
तुम्हें कोई जरूरत नहीं हमारी चिन्ता करने की

जब
साइकिल पर चढ़ाकर हमसे अपनी बाग से मौसम का पहला आम तुड़वाया था
मैंने जीवन में पहली बार अपनी बाग में पकता आम देखा था
तब कहना चाहिए था यह जिन्दगी हमारी है
तुम अपना आम खाओ हम अपना उत्साह अपनी लगाई बाग में पूरा करेंगे

जब
रोज बैठाकर स्कूल ले जाया करते थे
उसका उत्साह भी होता था और डर भी
तब कहना चाहिए था यह जिन्दगी हमारी है
मैं पढ़ूँ या ऐसे ही रह जाऊँ किसी का क्या जाता है

जब
बार बार समझाते थे और कभी कभी डाटते थे
कि कैसे रहो तो ठीक लगोगे, स्मार्ट लगोगे, अच्छे बनोगे
तब कहना चाहिए था यह जिन्दगी हमारी है
मैं कैसा भी लगूँ किसी का क्या जाता है
इंप्रेशन तो मेरा प्रभावित होगा (हम इसमें सचमुच लापरवाह रहे)

जब
मैं दो-तीन साल का था
याद नहीं कि मुझे क्या हुआ था
पर याद हैं वे चार खुराक दवाई वाली पतली सी शीशियाँ
वे लाल, भूरी, पीली दवाएँ मेरे लिए अक्सर लाते थे
एक दवा का तो स्वाद भी अब तक याद है
तब कहना चाहिए था यह जिन्दगी हमारी है
कोई जरूरत नहीं हमारा इलाज कराने की
हम रोगी रहें या ठीक रहें किसी का क्या

मुझे याद नहीं पर नाना ने बताया था
मैं पहले साल में खूब बीमार रहता था
तब कहना चाहिए था यह जिन्दगी हमारी है
कोई जरूरत नहीं हमें बचाने की

पर अब...
सचमुच देर हो गई है यह कहने में
कि यह जिन्दगी हमारी है, सिर्फ़ हमारी
किसी का हक नहीं इस पर
किसी का हक नहीं इसमें दखल देने का
असल में अपनी जिन्दगी का हक कई टुकड़ों में बाँट चुका हूँ
जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा अब भी अपने ही पास है
इसलिए अब भी अपनी मर्जी खूब चलाता हूँ
पर ------सिर्फ़------ का अधिकार मुट्ठी से फिसल चुका है

Friday, November 25, 2011

पुस्तकं प्रकाशितम्




मम एम्.फिल. शोधः पुस्तकरूपेण प्रकाशितम् जर्मनीदेशस्य लैंबर्टाख्येन प्रकाशनसंस्थानेन । अद्य मया गूगले अन्वेषितं तदा प्रथमे पृष्ठे सप्त परिणामाः अस्माकं पुस्तकस्य आसन्

Tuesday, April 12, 2011

एक बच्चे का बच्चे सा दिल

एक बच्चे का बच्चे सा दिल बचकानी हरकत करता है
वह बच्चा वह हरकत दिल की दिखलाने में भी डरता है
जोर बहुत देते हैं सब कि जो दिल में है खोल के रख दो
लोग न समझेंगे इस कारण कुछ कह पाने में डरता है

एक बच्चे का बच्चे सा दिल

एक बच्चे का बच्चे सा दिल बचकानी हरकत करता है
वह बच्चा वह हरकत दिल की दिखलाने में भी डरता है
जोर बहुत देते हैं सब कि जो दिल में है खोल के रख दो
लोग न समझेंगे इस कारण कुछ कह पाने में डरता है

Wednesday, March 2, 2011

शिवरात्रि की शुभकामनाएँ

या सृष्टिः स्रष्टुराद्या वहतिविधिहुतं या हविर्या च होत्री
ये द्वे कालं विधत्तः श्रुतिविषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वं ।
यामाहुः सर्वबीजप्रकृतिरिति यया प्राणिनः प्राणवन्तः
प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टाभिरीशः ॥

Monday, October 25, 2010

रुदाष्टक

नमामीशमीशाननिर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥१॥

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशं ।
करालं महाकालकालं कृपालं गुणागारसंसारसारं नतोऽहम् ॥२॥

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं मनोभूतकोटिप्रभाश्रीशरीरम् ।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारु गंगा लसद्भालबालेन्दुकण्ठे भुजंगा ॥३॥

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥४॥

प्रचण्डं प्रकष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम् ।
त्रयःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥५॥

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारि ।
चिदानन्दसन्दोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारि ॥६॥

न यावद् उमानाथपादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
न तावत् सुखं शान्तिसन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥७॥

न जानामि योगं जपं नैव पूनां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम् ।
जराजन्मदुःखौघतातप्यमानं प्रभो पाहि आपान्नमामीश शम्भो ॥८॥
_______________________________________________

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ।
ये पठन्ति नराः भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥
_______________________________________________

सुनि बिनती सर्बग्य सिव, देखि बिप्र अनुराग ।
पुनि मन्दिर नभबानी भइ, द्विजवर वर माँगु ॥

जो प्रसन्न प्रभु मो पर, नाथ दीन पर नेहु ।
निज पद भगति देहु प्रभु, पुनि दूसर बरु देहु ॥

तव माया बस जीव जड़, संतत फिरहिं भुलान ।
तिन पर क्रोध न करिय प्रभु, कृपासिंधु भगवान ॥

संकर दीन दयाल अब, यहि पर होहु कृपाल ।
साप अनुग्रह होहि जेहिं, नाथ थोरहीं काल ॥

Sunday, June 27, 2010

किसे हिन्दू कहेंगे

इस पोस्ट में मेरा मौलिक लेख न होकर उद्धृत लेख है यद्यपि अधिकतर बातें मेरी हैं । यहाँ पर फ़ेसबुक पर स्वप्निल सोनी की एक पोस्ट पर की गई मेरी तीन टिप्पणियों का संकलन है । वह मूल पोस्ट इस प्रकार थी ---

जो संगठन कभी हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए बने थे उनका उद्देश्य मुसलमानों से हिन्दुओ की रक्षा करना था आज वो अपने आप को हिन्दू नहीं मानते !जैन अपने आप को और ऐसे तमाम भगोड़े संगठन हिन्दू धर्म से निकले है आज का दलित अपने आप को हिन्दू कहने से कतरा रहा है वह मनुवादी कह कर आलोचना कर रहा है.कई राज्यों में हिन्दू नाम मात्र का है.... सवाल ये है कि फिर हिन्दू बचा कहा किसे हिन्दु कहेंगे ?

इस पर मेरी की हुई तीन टिप्पणियाँ इस प्रकार हैं ---

पहली टिप्पणी

अब इस विषय पर अपनी बात रख रहा हूँ । हिन्दू धर्म के लोग एक फ़ैक्ट्री से निकले हुए उत्पाद नहीं हैं जो पूरी तरह एक से हों । उनमें थोड़ी नहीं बहुत भिन्नता होती है और वे उन भिन्नताओं के बावजूद अपने में से एक देख सकते हैं । आज भी जो विभिन्नताओं के बावजूद सबको अपने में शामिल कर सकने की भावना रखता है, अपने को हिन्दू मानता है । इसीलिए, जाति के आधार पर भेदभाव करने वाला भी उन सभी जातियों को हिन्दू समझता है ।

अब बात यह कि दूसरे संगठन अलग कैसे हो गए । जो केवल एक प्रकार में अपने को सीमित मानने लगते हैं, वे अपने को हिन्दू से अलग मानने लगते हैं । हिन्दुओं में से युद्धवीर लोगों ने धर्म की रक्षा का संकल्प लिया, पर उन्हें जब आम हिन्दू अपने से कम वीर, कम उत्साही, लड़ाई में बराबरी से भाग न लेने वाला दिखने लगा, वे अपने आप को अलग समझने लगे ।

दूसरी तरफ़, हिन्दू धर्म की बीमारियों को दूर करने के लिए (निरर्थक हिंसा, असमानता आदि) जो संगठन बने, वे जब अपने को अधिक अहिंसक और सुशील समझने लगे तो आम हिन्दू उन्हें बड़ा बिगड़ैल दिखने लगा, तो उसे भी सुधारने के बजाय अपने को उनसे अलग समझना ठीक समझा ।रही बातदलितों के अपने आप को हिन्दू न समझने की, तो ऐसा वे ही करते हैं जो अपने को बौद्ध धर्म में दीक्षित मान लेते हैं । पर इससे क्या फ़र्क पड़ता है, बौद्ध और जैन धर्म संन्यासी धर्म हैं, उनमें जाति नहीं होती । हिन्दू धर्म में भी संन्यासी की जाति नहीं रह जाती । वे कहने को धर्म परिवर्तन करते हैं कि जातिवादी धर्म को छोड़कर जातिविहीन धर्म को अपना रहे हैं, पर वहाँ भी अपने को जाति से ही पहचानते हैं, जाति नहीं छूटती ।

मेरे इस विचार से बात यह निकली कि हिंसा हो या अहिंसा, किसी भी पक्ष में जो अतिवादी हो जाता है, वह हिन्दू धर्म से अपने को अलग समझने लगता है । जो समावेशवादी होता है, वह हिन्दू रहता है, अपने को हिन्दू कहता है । मैं अपने को हिन्दू समझता हूँ, सिकुलर हिन्दुओं को भी हिन्दू समझता हूँ, कट्टर हिन्दुओं को भी । वे छद्म धर्मनिरपेक्ष जो हिन्दुत्व की गर्दन दबाकर ही अपनी धर्मनिरपेक्षता का सबूत दे पाते हैं और जो कट्टरवादी घिनौनी करतूतों से हिन्दू धर्म को बदनाम करते हैं, उन्हें मैं हिन्दू के नाम पर कलंक मानता हूँ पर उनके हिन्दू होने से इनकार नहीं करता, उन्हें भी हिन्दू मानता हूँ । मैं हिन्दू हूँ ।


दूसरी टिप्पणी

अब ऊपर भटके हुए विषय के बारे में भी कुछ । ..... जी की उस टिप्पणी को मैंने नहीं पढ़ा जिस पर अत्यधिक विवाद हुआ पर लोगों की टिप्पणियों को देखकर लगता है कि वह आपत्तिजनक रही होगी । संकेतॊ से जैसा अनुमान होता है, मेरी ओर से भी वह निन्दनीय है । इनका रवैया भी बहुत उत्तेजक है जो मेरे जैसे स्वभाव वाले से बहुत दूर है । पर जहाँ से बात शुरू हुई थी --- जो संगठन --- ऐसे ही उबलते खून वाले लोगों से बना था । उसमें अहिंसक संन्यासी नहीं थे बल्कि धर्म और देश के लिए मर मिटने के जुनून वाले लोग थे । धर्म की रक्षा करने वाले संगठन ऐसे लोगों से नहीं बर सकते जो एक वीर राजा और उसकी सेना को भी अहिंसक संन्यासी बना दे और लड़ाई से बचने के लिए आततायियों से सन्धि करने की सलाह दे ।

ऐसे कट्टरवादियों की वजह से हमारे धर्म की बदनामी होती है, लेकिन हमें ऐसा बनने की जरूरत इसलिए नहीं महसूस होती कि यह भूकिमा दूसरे लोग निभा रहे हैं । उदारवादियों की कट्टरवादेयों से रक्षा कट्टरवादियों द्वारा ही होती है । उदारवादियों को उनको अपना समझकर अतिवाद से रोकना अवश्य चाहिए पर उनकी भूमिका को जानते हुए बहिष्कार नही करना चाहिए । निन्दनीय व्यक्ति और निन्दनीय कर्म की निन्दा अवश्य करनी चाहिए और उसे अवश्य रोकना चाहिए । इस तरह उदारवादियों को भी कट्टरवादियों की कुकर्म से रक्षा करनी चाहिए । ऐसे समावेशवादी ही अपने को हिन्दू समझने में सहज रहते हैं । सहज का मतलब कि जो हिन्दू समझकर उत्तेजित भी न हो और अपने पर शर्म भी न करे । इसको बड़े उदाहरण से ऐसे समझ सकते हैं कि हम देश के अन्दर अहिंसा की बात कर लेते हैं, मानवाधिकार वादी अपराधियों को आराम देने को विवश कर देते हैं, क्योंकि सीमा पर लाखों सैनिक सदा हिंसा को तैयार रहते हैं ।

कट्टरवादियों से रक्षा हम जैसे सीधे सादे लोग नहीं कर सकते । कश्मीरी पंडित बड़े सीधे साधे लोग होते हैं, वे बड़े आदर्श नागरिक समझे जाते हैं, बड़े उदारवादी । उनमें अगर खौलते खून वाले लोग होते तो उनकी यह दुर्दशा न होती जो आज है । अपने ही देश में शरणार्थी होकर रहना पड़ रहा है । अपने घर-ज़मीन मिलने की आशा पता नही कितने लोगों में बची होगी । हम खुद ऐसे नहीं बन सकते, यह वही कर सकते हैं जिनका यह स्वभाव है ।फिर मुद्दे पर । --- जो संगठन --- इसमें उस आम हिन्दू का भी दोष है जो अपने को हिन्दू कहता तो रहा पर अपने ही लिए रक्षा को हिंसक स्वभाव अपनाने वालों को उनके इस दुर्गुण के कारण घृणा करने लगे, और अपनेको उनसे श्रेष्ठ समझने लगे । उन्हें अतिवाद से रोकते पर अपनापन बनाए रखते तो क्यों अलग पहचान बनाने को प्रेरित होते ।

तीसरी टिप्पणी

मेरी तीसरी टिप्पणी में शायद मेरा मत तीसरा लगे, लोगों को भ्रम हो जाए कि मेरी विचारधारा क्या है, उसके लिए फिर से कहता हूँ कि मैं किसी विचारधारा की फ़ैक्ट्री में बना उत्पाद नहीं हूँ जो साँचे में ढला हुआ दिखूँ । कट्टरवादियों का मैं समर्थन नहीं करता । अगर हमारी भलाई के लिए भी वे अपराध करें तो भी मैं इस बात का समर्थन करूँगा कि उनको इस अपराध की सज़ा दी जाए । क्योंकि भावना के साथ न्याय-व्यवस्था भी बनाए रखनी है । लेकिन इनका अस्तित्व समाज में आवश्यक समझता हूँ यद्यपि मैं इनके साथ नहीं खड़ा होऊँगा कि मेरे स्वभाव से यह मेल नहीं खाता ।

हिन्दू धर्म सबसे उदार है - कह लीजिए कि खिचड़ी की तरह मुलायम कि बिना दाँत वाला भी खा ले । यहाँ मैं फिर विषयान्तर कर रहा हूँ । धर्म परिवर्तन के लिए हिन्दू धर्म ही सबसे सॉफ़्ट टारगेट है । हम जो अपनी निजी जिन्दगी, अपनी पढाई, अपनी नौकरी से ऊपर सिर नहीं उठा सकते, वे इस बात को देखते हुए भी रोक नहीं सकते । इंटेलेक्चुअल भी यदि तर्क और सबूत देकर रुकवाना चाहे तो वह भी दूसरे तर्कों और सबूतों से दबा दिया जाएगा और उनका योगदान अक्सर बेअसर रह जाता है । यहाँ भी उनका काम असर करता है जिन्हें हम अनुदार, कट्टरवादी, बिगड़ैल और गुण्डे कहते हैं, जो तर्कों में फँसने के बजाय सीधे काम करते हैं । उनकी अतिवादिता अवश्य शर्मनाक है जो घिनौने कृत्य वे इस प्रक्रिया में कर जाते हैं । इन्हें मुलायम खिचड़ी में कंकड़ समझिये जो स्वाद बिगाड़ देते हैं । पर खिचड़ी में कंकड़ होने पर लोग उसे खाने में डरने लगते हैं ।

Saturday, June 12, 2010

कोकाकोला और एंडरसन

आमिर खान कहा करते थे - मुझे विश्वास है कोकाकोला पूरी तरह सुरक्षित है । पहले मुझे उनके इस वक्तव्य पर गुस्सा आया, फिर मैं उससे सहमत होने लगा । हाँ कोकाकोला पूरी तरह सुरक्षित है, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है । असुरक्षित तो सुनीता नारायण, बाबा रामदेव तथा उनका विरोध करने वाली सरकारी और गैरसरकारी संस्थाएँ हैं, जिनपर सच बोलने के लिए भी पाबन्दी लगाई जा सकती है । इसके समर्थन में मुझे यही उदाहरण याद आया था जिसे आज लोग बहुत अच्छी तरह जानते हैं - भोपाल गैस काण्ड के आरोपी का किसी ने क्या बिगाड़ लिया । एक तो यहाँ की सरकार ही उसे सुरक्षा देती है, अगर वह कुछ करना भी चाहे तो आरोपित के पीछे उसके देश की सरकार का हाथ है ।

ऐसा नहीं है कि मौका देखकर अभी बात बना रहा हूँ । तब भी मेरे मन में यही उदाहरण आया था, पर मैं सोच कर रह जाता था कि कहूँगा भी तो समझ में किसे आएगा? मुझे बात की जानकारी थी पर उससे जुड़े तथ्यों की नहीं । पर आज कोई भी इसे आसानी से समझेगा ।

Monday, December 7, 2009

उल्टा तीर पर पढ़ें कुमारेन्द्र जी की पोस्ट

उल्टा तीर पर पढ़ें कुमारेन्द्र जी की पोस्ट
खुली चिट्ठी देश के नाम

http://ultateer.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html

Wednesday, December 17, 2008

हिन्द-युग्म: 28 दिसम्बर 2008 को हिन्द-युग्म मनाएगा वार्षिकोत्सव (मुख्य अतिथि- राजेन्द्र यादव)

हिन्द-युग्म: 28 दिसम्बर 2008 को हिन्द-युग्म मनाएगा वार्षिकोत्सव (मुख्य अतिथि- राजेन्द्र यादव)

जैसाकि हमने २७ अक्टूबर २००८ को उद्घोषणा की थी कि इस साल के अंत में हम चार पाठकों को 'हिन्द-युग्म पाठक सम्मान २००८' से सम्मानित करेंगे। यद्यपि यह सम्मान तो पिछले साल से ही दिया जा रहा है, लेकिन इस बार हमने तय किया था कि इस सम्मान को एक समारोह में चोटी के साहित्यकारों के हाथों दिलवायेंगे।तो मित्रो, हम उपस्थित उन चार पाठकों के नाम लेकर जिन्हें आने वाले २८ दिसम्बर के कार्यक्रम 'हिन्द-युग्म वार्षिकोत्सव २००८' में गणमान्य साहित्यकारों के हाथों यह पुरस्कार दिया जाना है। साथ में बहुत सी गतिविधियाँ और होंगी जिसकी रूपरेखा लेकर हम उपस्थित हुये हैं। वर्ष २००८ में जिन चार पाठकों ने हिन्द-युग्म को सबसे अधिक पढ़ा, वे हैं-आलोक सिंह 'साहिल' दीपाली मिश्रा पूजा अनिल, और सुमित भारद्वाज इन चारों पाठकों के हस्ताक्षर हिन्द-युग्म के सभी मंचों की अधिकाधिक प्रविष्टियों पर उपलब्ध हैं। उपर्युक्त चार पाठकों को २८ दिसम्बर २००८ को धर्मवीर संगोष्ठी कक्ष ( तृतीय तल, हिन्दी भवन, आई टी ओ, दिल्ली) में प्रशस्ति-पत्र, स्मृति चिह्न और पाँच-पाँच पुस्तकों का बंडल दिया जायेगा।जिन गणमान्य लोगों के सानिध्य में यह कार्यक्रम होगा, उनके नाम हैं-मुख्य अतिथि- राजेन्द्र यादव (प्रख्यात साहित्यकार तथा 'हंस' के संपादक)

Friday, December 5, 2008

आतंकवाद पर उलटा तीर की पोस्ट

आज बीए के छात्रों के ब्लॉग देखते हुए मुझे एक छात्र के ब्लॉग में टिपण्णी में अमित कुमार सागर जी के ब्लॉग का लिंक मिल गया । उस पर हमें यहाँ लेख मिला जो उन्होंने " शमा " जी के ब्लॉग पर से उद्धृत किया है इसे आप लोग अवश्य पढ़ें सम्पर्क सूत्र है - http://ultateer.blogspot.com/2008/11/blog-post_28.html

Tuesday, July 22, 2008

सहपाठिनां सह प्रथमतया साफल्येन गुहासु सम्मोदनम्

अथ काले गच्छति अहं सहपाठिनां सह कन्दराणाम् अन्वेषणाय कृतनिश्चयः आसम् । अतः पूर्वोक्तस्य दिनस्य सप्ताहं पश्चात् चत्वारः जनाः मध्याह्ने भोजनोपरान्ते गुहासु अन्वेषणं कर्तुं प्रस्थिताः । मया सह राकेशः, नीलमः, कल्पना च आसन् । यत्र अस्माभिः प्रथमा गुहा दृष्टा आसीत्, तत एव वयं प्रारम्भम् अकुर्म । अद्य जनवरीमासस्य सप्तमदिनांकः आसीत् । वयं सर्वे तस्यां गुहायां प्रविश्य आनन्दम् अन्वभवाम । किञ्चिदेव कालं स्थित्वा वयम् अन्याः कन्दराः अन्वेष्टुं प्रस्थिताः । कण्टकाकीर्णानि स्तम्बानि विचालयन्तः मार्गं कुर्वन्तः वयम् अपराः अपराः च गुहाः अपश्याम । अथ क्रमेण प्राचीनः निर्जलः एकः कूपः अपि दृष्टः । तस्य एव समीपे विशालाः विशालाः शिलाः भित्तीः निर्मायन् छदरहितं कक्षमिव स्थानं दर्शयन्त्यः आसन् । तत्र स्थानं सर्वतः उच्चप्रदेशेन आवेष्टितम् आसीत् । वयं भूतलात् अति नते स्थले आस्म । अग्रे गन्तुम् अस्माभिः उपरि गन्तव्यम् आसीत् परं तीक्ष्णप्रवणासु शिलासु आरोहन्तुं दुष्करम् आसीत् । अत्युच्चे तत्र एकः वटवृक्षः तटवर्ती आसीत् । तस्य मूलानि भित्तितः अवतीर्णानि आसन् । तान् एव अवलम्ब्य वयम् वयं चत्वारोऽपि आरुह्य उपरि गताः । ततः अग्रे गत्वा अन्याः अनेकान् गह्वरान् अन्वेषयन् तेषु च मनः आमोदयन् वयं अति स्रस्ता भूत्वा गुहावल्याः अन्तं यावत् विश्वविद्यालयस्य दक्षिणां सीमां प्राप्ताः । ततः पुनः प्रवणासु शिलासु एकेन निम्बवृक्षेण बद्धया टायरशृंखलया आरूह्य विश्वविद्यलयात् बहिः वसन्तकुंजं अगच्छाम । ततः बहिः बहिः भ्रमन्तः वयम् विश्वविद्यालयस्य पश्चिमद्वारात् प्रविश्य स्वेषु स्वेषु छात्रावासेषु गतवन्तः ।

Thursday, January 24, 2008

अन्तःसंस्थान क्रिकेट प्रतियोगिता में पहली जीत

२१ जनवरी २००८ से ३० जनवरी २००८ तक के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अन्तःसंस्थान क्रिकेट प्रतियोगिता आयोजित हो रही है । तीन समूहों में सभी संस्थानों और केन्द्रों की १० टीमों को बाँटा गया है । हमारे समूह में तीन टीमें हैं- पर्यावरण विज्ञान संस्थान, हमारा विशिष्ट संस्कृत अध्ययन केन्द्र और कला एवं सौन्दर्यशास्त्र संस्थान । कल पूर्वाह्न में पर्यावरण विज्ञान संस्थान से हुए मैच में हमारी टीम हार गई थी परन्तु आज कला एवं सौन्दर्यशास्त्र संस्थान पर हमने सात विकेट से जीत दर्ज करके पहली जीत पाई है । हमारे केन्द्र की ओर से जीतने वाली टीम का सदस्य और जीत का सहभागी होने की खुशी है ।

मैन ऑफ़ द मैच का स्थान एम ए प्रथम वर्ष के छात्र रजनीश कुमार पाण्डेय को मिला । उन्होंने २३ गेंदों पर सात चौके लगाकर ३७ रन बनाए और अविजित रहे । नीरज ने १६ (अविजित), महेन्द्र ने १४, वेद प्रकाश जी ने ४ और बलदेव ने ० रन बनाए । जीत के समय दसवाँ ओवर चल रहा था और छः ओवर बाकी थे । गेंदबाजी में महेन्द्र ने २ विकेट लिए और उनकी गेंद पर २ रन आउट हुए । पूरन ने २ विकेट लिए । बाकी चार विकेट नीरज और बलदेव ने लिए (हालाँकि यह विवरण ठीक से याद नहीं) । आलोक को यद्यपि कोई विकेट नहीं मिला परन्तु अच्छी गेंदबाजी करते हुए उन्होंने तीन ओवर में मात्र बारह रन दिए । पिछले वर्ष इन्हीं आलोक ने तीन ओवर में ही सोलह रन देकर तीन विकेट भी लिए थे ।

हमारे विशिष्ट संस्कृत अध्ययन केन्द्र की स्थापना सन् २००० में हुई । इस साल से पहले चार टूर्नामेण्ट हमारी टीम खेली है । उनमें हमें किसी में भी जीत नहीं मिल पाई थी । एम ए का पहला बैच २००३ में आया और २००३-४ के टूर्नामेण्ट में हमारी टीम पहली बार खेली थी । उसके अगले वर्ष २००४-५ में (जो हमारे बैच का पहला सत्र था) इस केन्द्र की टीम ने भाषा संस्थान (एस एल) से ड्रॉ खेला था । यही अब तक का सर्वश्रेष्ठ रिकॉर्ड था । उस बार हमारी टीम ने १३४ रन बनाए थे । इस जीत को दर्ज करके हमारे जीतने की शुरुआत हुई है । यद्यपि सेमीफाइनल में हम नहीं पहुँच पाए हैं पर आगे यह जीत का सिलसिला जारी रखने के लिए आप सभी की शुभकामनाएँ हमारे साथ हैं ।

Wednesday, January 9, 2008

गुफान्वेषणक्रमे प्रथमकन्दराप्राप्तिः

वयं कन्दरान्वेषणोत्सुकाः जनैः जनैः पृष्टवन्तः कुत्र कन्दराः, कुतः केन, मार्गेण, कस्यां दिशि ताः प्राप्तव्याः इति, क्वचित् क्वचित् उत्तरं प्राप्यते स्म । कतिपयदिनेषु यावत् न कोऽपि प्राप्तः यः कथयेत् यत् अहं तत्र गतवान्, तासां मार्गं जानामि इत्यादिः । कोऽपि कथयेत् संस्कृतकेन्द्रस्ये पश्च ताः सन्ति, कोऽपि कथयेत् अकादमिक-स्टॉफकालेजस्य पार्श्वात् मार्गः गच्छति । २००४ ईसवीयसत्रस्य समाप्तौ लखनऊविश्वविद्यालयस्य द्वौ सहपाठिनौ अस्माकं पार्श्वे आयातौ । एकदा तौ द्वौ- विवेकः हनुमानप्रसादपाण्डेयः च, सुरजीतः अहं च निश्चयं कृत्वा दक्षिणवने कन्दरान्वेषणाय प्रस्थिताः । तत्र गच्छन्तः वयं विशालाः विशालाः शिलाः दृष्ट्वा तत्र गुफा सम्भवति इति अनुमीय अनुमीय अत्र तत्र अपश्याम । एकत्र गत्वा लघुकूपाकारः गह्वरः प्राप्तः । मम तु प्रसन्नता आशा च अत्यधिकं वर्द्धिता । तं लघुगह्वरं दृष्ट्वा हनुमानप्रसादः उपेक्षता अवदत् "ई गुफा ह ?" तस्य उपेक्षा मां न अरुचत् । मन्ये अत्र अजन्ता-एलोरा इव विशालाः कन्दराः न सन्ति, कथं कोऽपि मम विश्वविद्यालयस्य लघुकन्दरान् उपेक्ष्यति ? विवेकः अरुचिं स्रस्तं चानुभवति स्म । तदा तत्र त्रयः लघुबालकाः वने एव आमोदं कुर्वन् तत्र आगताः । ते अबोधयन् यत् अत्र कन्दराः सन्ति याः कक्षपरिमाणा अपि सन्ति । तेषां वचनं श्रुत्वा हनुमानप्रसादः विश्वासमकरोत् यत् अत्र सत्यमेव कन्दराः सन्ति । ते बालकाः तत्र समीपमेव एकां कन्दरां अस्मान् प्रादर्शयन् तस्यां प्राविशन् च । विवेकस्य अरुचिं दृष्ट्वा अन्यस्मिन् दिने विस्तरेण गुफान्वेषणं करिष्याम इति निश्चीय वयं न्यवर्तयम् ।

अन्यस्मिन् दिने किं अभवत्......... अग्रे कथयिष्यामः........नमस्कारः.......