Sunday, June 27, 2010

किसे हिन्दू कहेंगे

इस पोस्ट में मेरा मौलिक लेख न होकर उद्धृत लेख है यद्यपि अधिकतर बातें मेरी हैं । यहाँ पर फ़ेसबुक पर स्वप्निल सोनी की एक पोस्ट पर की गई मेरी तीन टिप्पणियों का संकलन है । वह मूल पोस्ट इस प्रकार थी ---

जो संगठन कभी हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए बने थे उनका उद्देश्य मुसलमानों से हिन्दुओ की रक्षा करना था आज वो अपने आप को हिन्दू नहीं मानते !जैन अपने आप को और ऐसे तमाम भगोड़े संगठन हिन्दू धर्म से निकले है आज का दलित अपने आप को हिन्दू कहने से कतरा रहा है वह मनुवादी कह कर आलोचना कर रहा है.कई राज्यों में हिन्दू नाम मात्र का है.... सवाल ये है कि फिर हिन्दू बचा कहा किसे हिन्दु कहेंगे ?

इस पर मेरी की हुई तीन टिप्पणियाँ इस प्रकार हैं ---

पहली टिप्पणी

अब इस विषय पर अपनी बात रख रहा हूँ । हिन्दू धर्म के लोग एक फ़ैक्ट्री से निकले हुए उत्पाद नहीं हैं जो पूरी तरह एक से हों । उनमें थोड़ी नहीं बहुत भिन्नता होती है और वे उन भिन्नताओं के बावजूद अपने में से एक देख सकते हैं । आज भी जो विभिन्नताओं के बावजूद सबको अपने में शामिल कर सकने की भावना रखता है, अपने को हिन्दू मानता है । इसीलिए, जाति के आधार पर भेदभाव करने वाला भी उन सभी जातियों को हिन्दू समझता है ।

अब बात यह कि दूसरे संगठन अलग कैसे हो गए । जो केवल एक प्रकार में अपने को सीमित मानने लगते हैं, वे अपने को हिन्दू से अलग मानने लगते हैं । हिन्दुओं में से युद्धवीर लोगों ने धर्म की रक्षा का संकल्प लिया, पर उन्हें जब आम हिन्दू अपने से कम वीर, कम उत्साही, लड़ाई में बराबरी से भाग न लेने वाला दिखने लगा, वे अपने आप को अलग समझने लगे ।

दूसरी तरफ़, हिन्दू धर्म की बीमारियों को दूर करने के लिए (निरर्थक हिंसा, असमानता आदि) जो संगठन बने, वे जब अपने को अधिक अहिंसक और सुशील समझने लगे तो आम हिन्दू उन्हें बड़ा बिगड़ैल दिखने लगा, तो उसे भी सुधारने के बजाय अपने को उनसे अलग समझना ठीक समझा ।रही बातदलितों के अपने आप को हिन्दू न समझने की, तो ऐसा वे ही करते हैं जो अपने को बौद्ध धर्म में दीक्षित मान लेते हैं । पर इससे क्या फ़र्क पड़ता है, बौद्ध और जैन धर्म संन्यासी धर्म हैं, उनमें जाति नहीं होती । हिन्दू धर्म में भी संन्यासी की जाति नहीं रह जाती । वे कहने को धर्म परिवर्तन करते हैं कि जातिवादी धर्म को छोड़कर जातिविहीन धर्म को अपना रहे हैं, पर वहाँ भी अपने को जाति से ही पहचानते हैं, जाति नहीं छूटती ।

मेरे इस विचार से बात यह निकली कि हिंसा हो या अहिंसा, किसी भी पक्ष में जो अतिवादी हो जाता है, वह हिन्दू धर्म से अपने को अलग समझने लगता है । जो समावेशवादी होता है, वह हिन्दू रहता है, अपने को हिन्दू कहता है । मैं अपने को हिन्दू समझता हूँ, सिकुलर हिन्दुओं को भी हिन्दू समझता हूँ, कट्टर हिन्दुओं को भी । वे छद्म धर्मनिरपेक्ष जो हिन्दुत्व की गर्दन दबाकर ही अपनी धर्मनिरपेक्षता का सबूत दे पाते हैं और जो कट्टरवादी घिनौनी करतूतों से हिन्दू धर्म को बदनाम करते हैं, उन्हें मैं हिन्दू के नाम पर कलंक मानता हूँ पर उनके हिन्दू होने से इनकार नहीं करता, उन्हें भी हिन्दू मानता हूँ । मैं हिन्दू हूँ ।


दूसरी टिप्पणी

अब ऊपर भटके हुए विषय के बारे में भी कुछ । ..... जी की उस टिप्पणी को मैंने नहीं पढ़ा जिस पर अत्यधिक विवाद हुआ पर लोगों की टिप्पणियों को देखकर लगता है कि वह आपत्तिजनक रही होगी । संकेतॊ से जैसा अनुमान होता है, मेरी ओर से भी वह निन्दनीय है । इनका रवैया भी बहुत उत्तेजक है जो मेरे जैसे स्वभाव वाले से बहुत दूर है । पर जहाँ से बात शुरू हुई थी --- जो संगठन --- ऐसे ही उबलते खून वाले लोगों से बना था । उसमें अहिंसक संन्यासी नहीं थे बल्कि धर्म और देश के लिए मर मिटने के जुनून वाले लोग थे । धर्म की रक्षा करने वाले संगठन ऐसे लोगों से नहीं बर सकते जो एक वीर राजा और उसकी सेना को भी अहिंसक संन्यासी बना दे और लड़ाई से बचने के लिए आततायियों से सन्धि करने की सलाह दे ।

ऐसे कट्टरवादियों की वजह से हमारे धर्म की बदनामी होती है, लेकिन हमें ऐसा बनने की जरूरत इसलिए नहीं महसूस होती कि यह भूकिमा दूसरे लोग निभा रहे हैं । उदारवादियों की कट्टरवादेयों से रक्षा कट्टरवादियों द्वारा ही होती है । उदारवादियों को उनको अपना समझकर अतिवाद से रोकना अवश्य चाहिए पर उनकी भूमिका को जानते हुए बहिष्कार नही करना चाहिए । निन्दनीय व्यक्ति और निन्दनीय कर्म की निन्दा अवश्य करनी चाहिए और उसे अवश्य रोकना चाहिए । इस तरह उदारवादियों को भी कट्टरवादियों की कुकर्म से रक्षा करनी चाहिए । ऐसे समावेशवादी ही अपने को हिन्दू समझने में सहज रहते हैं । सहज का मतलब कि जो हिन्दू समझकर उत्तेजित भी न हो और अपने पर शर्म भी न करे । इसको बड़े उदाहरण से ऐसे समझ सकते हैं कि हम देश के अन्दर अहिंसा की बात कर लेते हैं, मानवाधिकार वादी अपराधियों को आराम देने को विवश कर देते हैं, क्योंकि सीमा पर लाखों सैनिक सदा हिंसा को तैयार रहते हैं ।

कट्टरवादियों से रक्षा हम जैसे सीधे सादे लोग नहीं कर सकते । कश्मीरी पंडित बड़े सीधे साधे लोग होते हैं, वे बड़े आदर्श नागरिक समझे जाते हैं, बड़े उदारवादी । उनमें अगर खौलते खून वाले लोग होते तो उनकी यह दुर्दशा न होती जो आज है । अपने ही देश में शरणार्थी होकर रहना पड़ रहा है । अपने घर-ज़मीन मिलने की आशा पता नही कितने लोगों में बची होगी । हम खुद ऐसे नहीं बन सकते, यह वही कर सकते हैं जिनका यह स्वभाव है ।फिर मुद्दे पर । --- जो संगठन --- इसमें उस आम हिन्दू का भी दोष है जो अपने को हिन्दू कहता तो रहा पर अपने ही लिए रक्षा को हिंसक स्वभाव अपनाने वालों को उनके इस दुर्गुण के कारण घृणा करने लगे, और अपनेको उनसे श्रेष्ठ समझने लगे । उन्हें अतिवाद से रोकते पर अपनापन बनाए रखते तो क्यों अलग पहचान बनाने को प्रेरित होते ।

तीसरी टिप्पणी

मेरी तीसरी टिप्पणी में शायद मेरा मत तीसरा लगे, लोगों को भ्रम हो जाए कि मेरी विचारधारा क्या है, उसके लिए फिर से कहता हूँ कि मैं किसी विचारधारा की फ़ैक्ट्री में बना उत्पाद नहीं हूँ जो साँचे में ढला हुआ दिखूँ । कट्टरवादियों का मैं समर्थन नहीं करता । अगर हमारी भलाई के लिए भी वे अपराध करें तो भी मैं इस बात का समर्थन करूँगा कि उनको इस अपराध की सज़ा दी जाए । क्योंकि भावना के साथ न्याय-व्यवस्था भी बनाए रखनी है । लेकिन इनका अस्तित्व समाज में आवश्यक समझता हूँ यद्यपि मैं इनके साथ नहीं खड़ा होऊँगा कि मेरे स्वभाव से यह मेल नहीं खाता ।

हिन्दू धर्म सबसे उदार है - कह लीजिए कि खिचड़ी की तरह मुलायम कि बिना दाँत वाला भी खा ले । यहाँ मैं फिर विषयान्तर कर रहा हूँ । धर्म परिवर्तन के लिए हिन्दू धर्म ही सबसे सॉफ़्ट टारगेट है । हम जो अपनी निजी जिन्दगी, अपनी पढाई, अपनी नौकरी से ऊपर सिर नहीं उठा सकते, वे इस बात को देखते हुए भी रोक नहीं सकते । इंटेलेक्चुअल भी यदि तर्क और सबूत देकर रुकवाना चाहे तो वह भी दूसरे तर्कों और सबूतों से दबा दिया जाएगा और उनका योगदान अक्सर बेअसर रह जाता है । यहाँ भी उनका काम असर करता है जिन्हें हम अनुदार, कट्टरवादी, बिगड़ैल और गुण्डे कहते हैं, जो तर्कों में फँसने के बजाय सीधे काम करते हैं । उनकी अतिवादिता अवश्य शर्मनाक है जो घिनौने कृत्य वे इस प्रक्रिया में कर जाते हैं । इन्हें मुलायम खिचड़ी में कंकड़ समझिये जो स्वाद बिगाड़ देते हैं । पर खिचड़ी में कंकड़ होने पर लोग उसे खाने में डरने लगते हैं ।

Saturday, June 12, 2010

कोकाकोला और एंडरसन

आमिर खान कहा करते थे - मुझे विश्वास है कोकाकोला पूरी तरह सुरक्षित है । पहले मुझे उनके इस वक्तव्य पर गुस्सा आया, फिर मैं उससे सहमत होने लगा । हाँ कोकाकोला पूरी तरह सुरक्षित है, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है । असुरक्षित तो सुनीता नारायण, बाबा रामदेव तथा उनका विरोध करने वाली सरकारी और गैरसरकारी संस्थाएँ हैं, जिनपर सच बोलने के लिए भी पाबन्दी लगाई जा सकती है । इसके समर्थन में मुझे यही उदाहरण याद आया था जिसे आज लोग बहुत अच्छी तरह जानते हैं - भोपाल गैस काण्ड के आरोपी का किसी ने क्या बिगाड़ लिया । एक तो यहाँ की सरकार ही उसे सुरक्षा देती है, अगर वह कुछ करना भी चाहे तो आरोपित के पीछे उसके देश की सरकार का हाथ है ।

ऐसा नहीं है कि मौका देखकर अभी बात बना रहा हूँ । तब भी मेरे मन में यही उदाहरण आया था, पर मैं सोच कर रह जाता था कि कहूँगा भी तो समझ में किसे आएगा? मुझे बात की जानकारी थी पर उससे जुड़े तथ्यों की नहीं । पर आज कोई भी इसे आसानी से समझेगा ।

Monday, December 7, 2009

उल्टा तीर पर पढ़ें कुमारेन्द्र जी की पोस्ट

उल्टा तीर पर पढ़ें कुमारेन्द्र जी की पोस्ट
खुली चिट्ठी देश के नाम

http://ultateer.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html

Wednesday, December 17, 2008

हिन्द-युग्म: 28 दिसम्बर 2008 को हिन्द-युग्म मनाएगा वार्षिकोत्सव (मुख्य अतिथि- राजेन्द्र यादव)

हिन्द-युग्म: 28 दिसम्बर 2008 को हिन्द-युग्म मनाएगा वार्षिकोत्सव (मुख्य अतिथि- राजेन्द्र यादव)

जैसाकि हमने २७ अक्टूबर २००८ को उद्घोषणा की थी कि इस साल के अंत में हम चार पाठकों को 'हिन्द-युग्म पाठक सम्मान २००८' से सम्मानित करेंगे। यद्यपि यह सम्मान तो पिछले साल से ही दिया जा रहा है, लेकिन इस बार हमने तय किया था कि इस सम्मान को एक समारोह में चोटी के साहित्यकारों के हाथों दिलवायेंगे।तो मित्रो, हम उपस्थित उन चार पाठकों के नाम लेकर जिन्हें आने वाले २८ दिसम्बर के कार्यक्रम 'हिन्द-युग्म वार्षिकोत्सव २००८' में गणमान्य साहित्यकारों के हाथों यह पुरस्कार दिया जाना है। साथ में बहुत सी गतिविधियाँ और होंगी जिसकी रूपरेखा लेकर हम उपस्थित हुये हैं। वर्ष २००८ में जिन चार पाठकों ने हिन्द-युग्म को सबसे अधिक पढ़ा, वे हैं-आलोक सिंह 'साहिल' दीपाली मिश्रा पूजा अनिल, और सुमित भारद्वाज इन चारों पाठकों के हस्ताक्षर हिन्द-युग्म के सभी मंचों की अधिकाधिक प्रविष्टियों पर उपलब्ध हैं। उपर्युक्त चार पाठकों को २८ दिसम्बर २००८ को धर्मवीर संगोष्ठी कक्ष ( तृतीय तल, हिन्दी भवन, आई टी ओ, दिल्ली) में प्रशस्ति-पत्र, स्मृति चिह्न और पाँच-पाँच पुस्तकों का बंडल दिया जायेगा।जिन गणमान्य लोगों के सानिध्य में यह कार्यक्रम होगा, उनके नाम हैं-मुख्य अतिथि- राजेन्द्र यादव (प्रख्यात साहित्यकार तथा 'हंस' के संपादक)

Friday, December 5, 2008

आतंकवाद पर उलटा तीर की पोस्ट

आज बीए के छात्रों के ब्लॉग देखते हुए मुझे एक छात्र के ब्लॉग में टिपण्णी में अमित कुमार सागर जी के ब्लॉग का लिंक मिल गया । उस पर हमें यहाँ लेख मिला जो उन्होंने " शमा " जी के ब्लॉग पर से उद्धृत किया है इसे आप लोग अवश्य पढ़ें सम्पर्क सूत्र है - http://ultateer.blogspot.com/2008/11/blog-post_28.html

Tuesday, July 22, 2008

सहपाठिनां सह प्रथमतया साफल्येन गुहासु सम्मोदनम्

अथ काले गच्छति अहं सहपाठिनां सह कन्दराणाम् अन्वेषणाय कृतनिश्चयः आसम् । अतः पूर्वोक्तस्य दिनस्य सप्ताहं पश्चात् चत्वारः जनाः मध्याह्ने भोजनोपरान्ते गुहासु अन्वेषणं कर्तुं प्रस्थिताः । मया सह राकेशः, नीलमः, कल्पना च आसन् । यत्र अस्माभिः प्रथमा गुहा दृष्टा आसीत्, तत एव वयं प्रारम्भम् अकुर्म । अद्य जनवरीमासस्य सप्तमदिनांकः आसीत् । वयं सर्वे तस्यां गुहायां प्रविश्य आनन्दम् अन्वभवाम । किञ्चिदेव कालं स्थित्वा वयम् अन्याः कन्दराः अन्वेष्टुं प्रस्थिताः । कण्टकाकीर्णानि स्तम्बानि विचालयन्तः मार्गं कुर्वन्तः वयम् अपराः अपराः च गुहाः अपश्याम । अथ क्रमेण प्राचीनः निर्जलः एकः कूपः अपि दृष्टः । तस्य एव समीपे विशालाः विशालाः शिलाः भित्तीः निर्मायन् छदरहितं कक्षमिव स्थानं दर्शयन्त्यः आसन् । तत्र स्थानं सर्वतः उच्चप्रदेशेन आवेष्टितम् आसीत् । वयं भूतलात् अति नते स्थले आस्म । अग्रे गन्तुम् अस्माभिः उपरि गन्तव्यम् आसीत् परं तीक्ष्णप्रवणासु शिलासु आरोहन्तुं दुष्करम् आसीत् । अत्युच्चे तत्र एकः वटवृक्षः तटवर्ती आसीत् । तस्य मूलानि भित्तितः अवतीर्णानि आसन् । तान् एव अवलम्ब्य वयम् वयं चत्वारोऽपि आरुह्य उपरि गताः । ततः अग्रे गत्वा अन्याः अनेकान् गह्वरान् अन्वेषयन् तेषु च मनः आमोदयन् वयं अति स्रस्ता भूत्वा गुहावल्याः अन्तं यावत् विश्वविद्यालयस्य दक्षिणां सीमां प्राप्ताः । ततः पुनः प्रवणासु शिलासु एकेन निम्बवृक्षेण बद्धया टायरशृंखलया आरूह्य विश्वविद्यलयात् बहिः वसन्तकुंजं अगच्छाम । ततः बहिः बहिः भ्रमन्तः वयम् विश्वविद्यालयस्य पश्चिमद्वारात् प्रविश्य स्वेषु स्वेषु छात्रावासेषु गतवन्तः ।

Thursday, January 24, 2008

अन्तःसंस्थान क्रिकेट प्रतियोगिता में पहली जीत

२१ जनवरी २००८ से ३० जनवरी २००८ तक के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अन्तःसंस्थान क्रिकेट प्रतियोगिता आयोजित हो रही है । तीन समूहों में सभी संस्थानों और केन्द्रों की १० टीमों को बाँटा गया है । हमारे समूह में तीन टीमें हैं- पर्यावरण विज्ञान संस्थान, हमारा विशिष्ट संस्कृत अध्ययन केन्द्र और कला एवं सौन्दर्यशास्त्र संस्थान । कल पूर्वाह्न में पर्यावरण विज्ञान संस्थान से हुए मैच में हमारी टीम हार गई थी परन्तु आज कला एवं सौन्दर्यशास्त्र संस्थान पर हमने सात विकेट से जीत दर्ज करके पहली जीत पाई है । हमारे केन्द्र की ओर से जीतने वाली टीम का सदस्य और जीत का सहभागी होने की खुशी है ।

मैन ऑफ़ द मैच का स्थान एम ए प्रथम वर्ष के छात्र रजनीश कुमार पाण्डेय को मिला । उन्होंने २३ गेंदों पर सात चौके लगाकर ३७ रन बनाए और अविजित रहे । नीरज ने १६ (अविजित), महेन्द्र ने १४, वेद प्रकाश जी ने ४ और बलदेव ने ० रन बनाए । जीत के समय दसवाँ ओवर चल रहा था और छः ओवर बाकी थे । गेंदबाजी में महेन्द्र ने २ विकेट लिए और उनकी गेंद पर २ रन आउट हुए । पूरन ने २ विकेट लिए । बाकी चार विकेट नीरज और बलदेव ने लिए (हालाँकि यह विवरण ठीक से याद नहीं) । आलोक को यद्यपि कोई विकेट नहीं मिला परन्तु अच्छी गेंदबाजी करते हुए उन्होंने तीन ओवर में मात्र बारह रन दिए । पिछले वर्ष इन्हीं आलोक ने तीन ओवर में ही सोलह रन देकर तीन विकेट भी लिए थे ।

हमारे विशिष्ट संस्कृत अध्ययन केन्द्र की स्थापना सन् २००० में हुई । इस साल से पहले चार टूर्नामेण्ट हमारी टीम खेली है । उनमें हमें किसी में भी जीत नहीं मिल पाई थी । एम ए का पहला बैच २००३ में आया और २००३-४ के टूर्नामेण्ट में हमारी टीम पहली बार खेली थी । उसके अगले वर्ष २००४-५ में (जो हमारे बैच का पहला सत्र था) इस केन्द्र की टीम ने भाषा संस्थान (एस एल) से ड्रॉ खेला था । यही अब तक का सर्वश्रेष्ठ रिकॉर्ड था । उस बार हमारी टीम ने १३४ रन बनाए थे । इस जीत को दर्ज करके हमारे जीतने की शुरुआत हुई है । यद्यपि सेमीफाइनल में हम नहीं पहुँच पाए हैं पर आगे यह जीत का सिलसिला जारी रखने के लिए आप सभी की शुभकामनाएँ हमारे साथ हैं ।

Wednesday, January 9, 2008

गुफान्वेषणक्रमे प्रथमकन्दराप्राप्तिः

वयं कन्दरान्वेषणोत्सुकाः जनैः जनैः पृष्टवन्तः कुत्र कन्दराः, कुतः केन, मार्गेण, कस्यां दिशि ताः प्राप्तव्याः इति, क्वचित् क्वचित् उत्तरं प्राप्यते स्म । कतिपयदिनेषु यावत् न कोऽपि प्राप्तः यः कथयेत् यत् अहं तत्र गतवान्, तासां मार्गं जानामि इत्यादिः । कोऽपि कथयेत् संस्कृतकेन्द्रस्ये पश्च ताः सन्ति, कोऽपि कथयेत् अकादमिक-स्टॉफकालेजस्य पार्श्वात् मार्गः गच्छति । २००४ ईसवीयसत्रस्य समाप्तौ लखनऊविश्वविद्यालयस्य द्वौ सहपाठिनौ अस्माकं पार्श्वे आयातौ । एकदा तौ द्वौ- विवेकः हनुमानप्रसादपाण्डेयः च, सुरजीतः अहं च निश्चयं कृत्वा दक्षिणवने कन्दरान्वेषणाय प्रस्थिताः । तत्र गच्छन्तः वयं विशालाः विशालाः शिलाः दृष्ट्वा तत्र गुफा सम्भवति इति अनुमीय अनुमीय अत्र तत्र अपश्याम । एकत्र गत्वा लघुकूपाकारः गह्वरः प्राप्तः । मम तु प्रसन्नता आशा च अत्यधिकं वर्द्धिता । तं लघुगह्वरं दृष्ट्वा हनुमानप्रसादः उपेक्षता अवदत् "ई गुफा ह ?" तस्य उपेक्षा मां न अरुचत् । मन्ये अत्र अजन्ता-एलोरा इव विशालाः कन्दराः न सन्ति, कथं कोऽपि मम विश्वविद्यालयस्य लघुकन्दरान् उपेक्ष्यति ? विवेकः अरुचिं स्रस्तं चानुभवति स्म । तदा तत्र त्रयः लघुबालकाः वने एव आमोदं कुर्वन् तत्र आगताः । ते अबोधयन् यत् अत्र कन्दराः सन्ति याः कक्षपरिमाणा अपि सन्ति । तेषां वचनं श्रुत्वा हनुमानप्रसादः विश्वासमकरोत् यत् अत्र सत्यमेव कन्दराः सन्ति । ते बालकाः तत्र समीपमेव एकां कन्दरां अस्मान् प्रादर्शयन् तस्यां प्राविशन् च । विवेकस्य अरुचिं दृष्ट्वा अन्यस्मिन् दिने विस्तरेण गुफान्वेषणं करिष्याम इति निश्चीय वयं न्यवर्तयम् ।

अन्यस्मिन् दिने किं अभवत्......... अग्रे कथयिष्यामः........नमस्कारः.......

Thursday, December 6, 2007

आरण्यकाः छात्राः कन्दराः प्रति प्रवृत्ताः (गुहान्वेषणम)

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालये ५ दिसम्बरे मानसूनसत्रः समाप्तः । अधुना त्रिवर्षपूर्वस्य स्मृतिः मम मनसि जागरति यदा मम अपि अत्र प्रथमः वर्ष आसीत् ।

अहं स्नातकोत्तरकक्षायां पठितुं २००४ क्रिष्टाब्दे अत्र आगच्छम् । मम प्रथम सत्रः (मानसून २००४) यदा समाप्तप्रायः आसीत्, आस्माभिः श्रुतं यत् विश्वविद्यालयेऽस्मिन् कन्दराः सन्ति । कुत्र सन्ति, अस्य पर्याप्ता सूचना नासीत् । ततः किम्? अस्माभिः विनिश्चितं यत् ताः ढुण्ढिष्यामहे (ढुण्ढिधातुः वेदे अन्वेषणार्थे प्रयुक्तः अस्ति) । तासां विषये केवलमिदं श्रुतमासीत् यत् ताः दक्षिणीये वने सन्ति । अनेकैः पृष्टम्, परं कोऽपि एतावत् न प्राप्तः यः कथयेत् यत् अहं तत्र गतः अस्मि, परं किञ्चित् किञ्चित् सूचना क्रमेण प्राप्ता जाता । यदा केवलं एतावद् एवे निश्चितमासीत् यत् कन्दराः सन्ति, एकस्मिन् रात्रौ, प्रायः एकादश वादने, वयं केचिज्जनाः स्व केन्द्रे (विशिष्ट संस्कृत अध्ययन केन्द्रे) संगणकीये परियोजनाकार्ये संलग्ना आस्म, रवीशः, एकः अन्यः अहं च सुरक्षाकर्मिणा प्रकाशनी (टॉर्च) आदाय अनुमानस्यैव आधारेण कन्दराः अन्वेष्टुं एकत्रस्थानतः वने प्रविष्टाः । सार्धं होरापर्यन्तं वयं तत्र अभ्रमन्, "अत्र विशालाः शिलाः सन्ति- अत्र कन्दरा सम्भवति", "अत्र गहने स्थाने सम्भवति" इत्यादीनि अनुमानानि कुर्वन् । चन्द्रिकामयी रात्रिरासीत् कन्दराः न प्राप्ताः परम् आनन्दः तु प्राप्तः । तद्रात्रौ वयं न्यवर्तयाम, अनेन निश्चयेन सह यत्, न अधुना, कदापि तु कन्दराः प्राप्स्यन्ते एव अस्माभिः । ततः निवृत्य, केन्द्रे आगत्य वयं आरण्यकम् अनुभवम् तत्र सहपाठिनः अश्रावयाम ।

अन्यस्मिन् दिने किं अभवत्......... अग्रे कथयिष्यामः........नमस्कारः

Sunday, November 18, 2007

वन्दे मातरम्


वन्दे मातरम्
सुजलां सुफलां
मलयजशीतलाम्
सस्यश्यामलां मातरम्
वन्दे मातरम्


शुभ्रज्योत्स्नां पुलकितयामिनीम्
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीम्
सुमधुरभाषिणीम्
सुखदां वरदां मातरम्
वन्दे मातरम् ॥

रामचरितमानस- सुन्दरकाण्ड मङ्गलाचरण

जय श्री राम

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम् ॥

नान्यास्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा ।
भक्तिं प्रयच्छ रभुपुङ्गवनिर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥

संस्कृते नवलेखनम्


लिखने वाले लिखते रहते हैं और पढ़ने वालों का इन्तज़ार नहीं करते । परन्तु इस बात से प्रभावित तो अवश्य होते हैं कि उनकी लिखी बात कितनी पढ़ी जा रही है । कोई इसी आशा में लिखता जाता है कि आज मेरी रचना न भी पढ़ी जाए तो क्या हुआ "कालोऽनन्तः विपुला च पृथिवी, कोई न कोई कभी न कभी तो धरती पर आएगा जो मेरी प्रतिभा को पहचानेगा ।" परन्तु एक बात तो है कि लिखने वाले को कोई तो प्रेरक तत्त्व चाहिए ही । संस्कृत में लिखने वालों के साथ यही प्रेरक की कमी है । यद्यपि कुछ पुरस्कार प्रेरक तो बनते हैं पर सबसे अच्छा प्रेरक है रचना का पढ़ा जाना । संस्कृत के लघु रचनाकारों की बात प्रकाशित नहीं हो पाती है इससे वे नया-नया लिखने को प्रोत्साहित नहीं होते ।

पर आज हमारे पास इस समस्या से मुक्ति का उपाय है- इण्टरनेट प्रकाशन । अपने ब्लॉग पर अपनी छोटी-बड़ी बातें लिखिए, जितना हो सके उतना नया और रचनात्मक लिखिए, उन्हें ज्यादा नहीं तो आपके आस-पास के लोग तो पढ़ लेंगे । और अच्छा हो जब वे उस ब्लॉगपोस्ट पर टिप्पणी (Comment) भी दें । दूसरों की प्रतिक्रिया देखकर आपका उत्साह बढ़ेगा और आप और अच्छा लिखने के किए प्रेरित होंगे । इसमें एक फायदा भी है कि इसमें आपके आसपास के लोगों की ही प्रतिक्रियाएँ होंगी, उद्भट विद्वानों की नहीं जो कृति के स्तर पर सवाल उठाएँगे । वे आपके आस-पास के लगभग आप जैसे ही लोग होंगे । आप दूसरों से ऐसे प्रोत्साहन की अपेक्षा रखें उससे पहले आवश्यक है कि आप जिनका ब्लॉग पढ़ें, तो यदि कुछ कहने लायक लगे तो उसपर टिप्पणी अवश्य दें । यह आपकी काव्य प्रतिभा को भी निखारने में सहयोगी होगा ।

Wednesday, July 11, 2007

गिरितनया


गिरि को अचल कहें या अचला गिरिजा को
_____तप नहीं जिनका गिरीश भी डिगाए हैं
बरस करोड़ों बीते अनुभव मीठे-तीते
_____शीश गिरिराज निज आज भी उठाए हैं

गौरी खुद जगमाता हिमवान ताके तात
_____तभी देवतातमा कहत कालिदास हैं
काको कहौं दोनों हैं एक से बढ़कर एक
_____गिरि से हैं गौरी या गौरी से गिरिराज हैं
------ ------- ------- ---------- ------- सूर्यांशी

Tuesday, July 10, 2007

मेरा चित्र

अमल धवल गिरि के शिखरों पर .......... ...... ...... बादल को घिरते देखा है

this is the site of Gulmarg (KASHMIR) while tracking to touch the snow with two other people NARAYAN JI AND ADARSH SHUKLA (11 November 2006)

साधना


सत्य है नित ही प्रगति हित है जरूरी साधना
रख तू अनुशासन स्वयं पर पर तू खुद को बांध ना
पथ पे कुछ बढ़ने से पहले मन को अपने दृढ़ करो
मन में जो हो साध ना तो क्या करेगी साधना ?

है नहीं पर्याय अनुशासन दमन का अपने ही
दमन ख़ुद का करके नष्ट करो न अपने सपने ही
भ्रम में हैं वे लोग जो यम-नियम को समझे दमन
दबने को वे नहीं कहते कहते बनने को सुजन -सूर्यांशी