उल्टा तीर पर पढ़ें कुमारेन्द्र जी की पोस्ट
खुली चिट्ठी देश के नाम
http://ultateer.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html
Monday, December 7, 2009
Wednesday, December 17, 2008
हिन्द-युग्म: 28 दिसम्बर 2008 को हिन्द-युग्म मनाएगा वार्षिकोत्सव (मुख्य अतिथि- राजेन्द्र यादव)
हिन्द-युग्म: 28 दिसम्बर 2008 को हिन्द-युग्म मनाएगा वार्षिकोत्सव (मुख्य अतिथि- राजेन्द्र यादव)
जैसाकि हमने २७ अक्टूबर २००८ को उद्घोषणा की थी कि इस साल के अंत में हम चार पाठकों को 'हिन्द-युग्म पाठक सम्मान २००८' से सम्मानित करेंगे। यद्यपि यह सम्मान तो पिछले साल से ही दिया जा रहा है, लेकिन इस बार हमने तय किया था कि इस सम्मान को एक समारोह में चोटी के साहित्यकारों के हाथों दिलवायेंगे।तो मित्रो, हम उपस्थित उन चार पाठकों के नाम लेकर जिन्हें आने वाले २८ दिसम्बर के कार्यक्रम 'हिन्द-युग्म वार्षिकोत्सव २००८' में गणमान्य साहित्यकारों के हाथों यह पुरस्कार दिया जाना है। साथ में बहुत सी गतिविधियाँ और होंगी जिसकी रूपरेखा लेकर हम उपस्थित हुये हैं। वर्ष २००८ में जिन चार पाठकों ने हिन्द-युग्म को सबसे अधिक पढ़ा, वे हैं-आलोक सिंह 'साहिल' दीपाली मिश्रा पूजा अनिल, और सुमित भारद्वाज इन चारों पाठकों के हस्ताक्षर हिन्द-युग्म के सभी मंचों की अधिकाधिक प्रविष्टियों पर उपलब्ध हैं। उपर्युक्त चार पाठकों को २८ दिसम्बर २००८ को धर्मवीर संगोष्ठी कक्ष ( तृतीय तल, हिन्दी भवन, आई टी ओ, दिल्ली) में प्रशस्ति-पत्र, स्मृति चिह्न और पाँच-पाँच पुस्तकों का बंडल दिया जायेगा।जिन गणमान्य लोगों के सानिध्य में यह कार्यक्रम होगा, उनके नाम हैं-मुख्य अतिथि- राजेन्द्र यादव (प्रख्यात साहित्यकार तथा 'हंस' के संपादक)
जैसाकि हमने २७ अक्टूबर २००८ को उद्घोषणा की थी कि इस साल के अंत में हम चार पाठकों को 'हिन्द-युग्म पाठक सम्मान २००८' से सम्मानित करेंगे। यद्यपि यह सम्मान तो पिछले साल से ही दिया जा रहा है, लेकिन इस बार हमने तय किया था कि इस सम्मान को एक समारोह में चोटी के साहित्यकारों के हाथों दिलवायेंगे।तो मित्रो, हम उपस्थित उन चार पाठकों के नाम लेकर जिन्हें आने वाले २८ दिसम्बर के कार्यक्रम 'हिन्द-युग्म वार्षिकोत्सव २००८' में गणमान्य साहित्यकारों के हाथों यह पुरस्कार दिया जाना है। साथ में बहुत सी गतिविधियाँ और होंगी जिसकी रूपरेखा लेकर हम उपस्थित हुये हैं। वर्ष २००८ में जिन चार पाठकों ने हिन्द-युग्म को सबसे अधिक पढ़ा, वे हैं-आलोक सिंह 'साहिल' दीपाली मिश्रा पूजा अनिल, और सुमित भारद्वाज इन चारों पाठकों के हस्ताक्षर हिन्द-युग्म के सभी मंचों की अधिकाधिक प्रविष्टियों पर उपलब्ध हैं। उपर्युक्त चार पाठकों को २८ दिसम्बर २००८ को धर्मवीर संगोष्ठी कक्ष ( तृतीय तल, हिन्दी भवन, आई टी ओ, दिल्ली) में प्रशस्ति-पत्र, स्मृति चिह्न और पाँच-पाँच पुस्तकों का बंडल दिया जायेगा।जिन गणमान्य लोगों के सानिध्य में यह कार्यक्रम होगा, उनके नाम हैं-मुख्य अतिथि- राजेन्द्र यादव (प्रख्यात साहित्यकार तथा 'हंस' के संपादक)
Friday, December 5, 2008
आतंकवाद पर उलटा तीर की पोस्ट
आज बीए के छात्रों के ब्लॉग देखते हुए मुझे एक छात्र के ब्लॉग में टिपण्णी में अमित कुमार सागर जी के ब्लॉग का लिंक मिल गया । उस पर हमें यहाँ लेख मिला जो उन्होंने " शमा " जी के ब्लॉग पर से उद्धृत किया है इसे आप लोग अवश्य पढ़ें सम्पर्क सूत्र है - http://ultateer.blogspot.com/2008/11/blog-post_28.html
Tuesday, July 22, 2008
सहपाठिनां सह प्रथमतया साफल्येन गुहासु सम्मोदनम्
अथ काले गच्छति अहं सहपाठिनां सह कन्दराणाम् अन्वेषणाय कृतनिश्चयः आसम् । अतः पूर्वोक्तस्य दिनस्य सप्ताहं पश्चात् चत्वारः जनाः मध्याह्ने भोजनोपरान्ते गुहासु अन्वेषणं कर्तुं प्रस्थिताः । मया सह राकेशः, नीलमः, कल्पना च आसन् । यत्र अस्माभिः प्रथमा गुहा दृष्टा आसीत्, तत एव वयं प्रारम्भम् अकुर्म । अद्य जनवरीमासस्य सप्तमदिनांकः आसीत् । वयं सर्वे तस्यां गुहायां प्रविश्य आनन्दम् अन्वभवाम । किञ्चिदेव कालं स्थित्वा वयम् अन्याः कन्दराः अन्वेष्टुं प्रस्थिताः । कण्टकाकीर्णानि स्तम्बानि विचालयन्तः मार्गं कुर्वन्तः वयम् अपराः अपराः च गुहाः अपश्याम । अथ क्रमेण प्राचीनः निर्जलः एकः कूपः अपि दृष्टः । तस्य एव समीपे विशालाः विशालाः शिलाः भित्तीः निर्मायन् छदरहितं कक्षमिव स्थानं दर्शयन्त्यः आसन् । तत्र स्थानं सर्वतः उच्चप्रदेशेन आवेष्टितम् आसीत् । वयं भूतलात् अति नते स्थले आस्म । अग्रे गन्तुम् अस्माभिः उपरि गन्तव्यम् आसीत् परं तीक्ष्णप्रवणासु शिलासु आरोहन्तुं दुष्करम् आसीत् । अत्युच्चे तत्र एकः वटवृक्षः तटवर्ती आसीत् । तस्य मूलानि भित्तितः अवतीर्णानि आसन् । तान् एव अवलम्ब्य वयम् वयं चत्वारोऽपि आरुह्य उपरि गताः । ततः अग्रे गत्वा अन्याः अनेकान् गह्वरान् अन्वेषयन् तेषु च मनः आमोदयन् वयं अति स्रस्ता भूत्वा गुहावल्याः अन्तं यावत् विश्वविद्यालयस्य दक्षिणां सीमां प्राप्ताः । ततः पुनः प्रवणासु शिलासु एकेन निम्बवृक्षेण बद्धया टायरशृंखलया आरूह्य विश्वविद्यलयात् बहिः वसन्तकुंजं अगच्छाम । ततः बहिः बहिः भ्रमन्तः वयम् विश्वविद्यालयस्य पश्चिमद्वारात् प्रविश्य स्वेषु स्वेषु छात्रावासेषु गतवन्तः ।
Thursday, January 24, 2008
अन्तःसंस्थान क्रिकेट प्रतियोगिता में पहली जीत
२१ जनवरी २००८ से ३० जनवरी २००८ तक के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अन्तःसंस्थान क्रिकेट प्रतियोगिता आयोजित हो रही है । तीन समूहों में सभी संस्थानों और केन्द्रों की १० टीमों को बाँटा गया है । हमारे समूह में तीन टीमें हैं- पर्यावरण विज्ञान संस्थान, हमारा विशिष्ट संस्कृत अध्ययन केन्द्र और कला एवं सौन्दर्यशास्त्र संस्थान । कल पूर्वाह्न में पर्यावरण विज्ञान संस्थान से हुए मैच में हमारी टीम हार गई थी परन्तु आज कला एवं सौन्दर्यशास्त्र संस्थान पर हमने सात विकेट से जीत दर्ज करके पहली जीत पाई है । हमारे केन्द्र की ओर से जीतने वाली टीम का सदस्य और जीत का सहभागी होने की खुशी है ।
मैन ऑफ़ द मैच का स्थान एम ए प्रथम वर्ष के छात्र रजनीश कुमार पाण्डेय को मिला । उन्होंने २३ गेंदों पर सात चौके लगाकर ३७ रन बनाए और अविजित रहे । नीरज ने १६ (अविजित), महेन्द्र ने १४, वेद प्रकाश जी ने ४ और बलदेव ने ० रन बनाए । जीत के समय दसवाँ ओवर चल रहा था और छः ओवर बाकी थे । गेंदबाजी में महेन्द्र ने २ विकेट लिए और उनकी गेंद पर २ रन आउट हुए । पूरन ने २ विकेट लिए । बाकी चार विकेट नीरज और बलदेव ने लिए (हालाँकि यह विवरण ठीक से याद नहीं) । आलोक को यद्यपि कोई विकेट नहीं मिला परन्तु अच्छी गेंदबाजी करते हुए उन्होंने तीन ओवर में मात्र बारह रन दिए । पिछले वर्ष इन्हीं आलोक ने तीन ओवर में ही सोलह रन देकर तीन विकेट भी लिए थे ।
हमारे विशिष्ट संस्कृत अध्ययन केन्द्र की स्थापना सन् २००० में हुई । इस साल से पहले चार टूर्नामेण्ट हमारी टीम खेली है । उनमें हमें किसी में भी जीत नहीं मिल पाई थी । एम ए का पहला बैच २००३ में आया और २००३-४ के टूर्नामेण्ट में हमारी टीम पहली बार खेली थी । उसके अगले वर्ष २००४-५ में (जो हमारे बैच का पहला सत्र था) इस केन्द्र की टीम ने भाषा संस्थान (एस एल) से ड्रॉ खेला था । यही अब तक का सर्वश्रेष्ठ रिकॉर्ड था । उस बार हमारी टीम ने १३४ रन बनाए थे । इस जीत को दर्ज करके हमारे जीतने की शुरुआत हुई है । यद्यपि सेमीफाइनल में हम नहीं पहुँच पाए हैं पर आगे यह जीत का सिलसिला जारी रखने के लिए आप सभी की शुभकामनाएँ हमारे साथ हैं ।
मैन ऑफ़ द मैच का स्थान एम ए प्रथम वर्ष के छात्र रजनीश कुमार पाण्डेय को मिला । उन्होंने २३ गेंदों पर सात चौके लगाकर ३७ रन बनाए और अविजित रहे । नीरज ने १६ (अविजित), महेन्द्र ने १४, वेद प्रकाश जी ने ४ और बलदेव ने ० रन बनाए । जीत के समय दसवाँ ओवर चल रहा था और छः ओवर बाकी थे । गेंदबाजी में महेन्द्र ने २ विकेट लिए और उनकी गेंद पर २ रन आउट हुए । पूरन ने २ विकेट लिए । बाकी चार विकेट नीरज और बलदेव ने लिए (हालाँकि यह विवरण ठीक से याद नहीं) । आलोक को यद्यपि कोई विकेट नहीं मिला परन्तु अच्छी गेंदबाजी करते हुए उन्होंने तीन ओवर में मात्र बारह रन दिए । पिछले वर्ष इन्हीं आलोक ने तीन ओवर में ही सोलह रन देकर तीन विकेट भी लिए थे ।
हमारे विशिष्ट संस्कृत अध्ययन केन्द्र की स्थापना सन् २००० में हुई । इस साल से पहले चार टूर्नामेण्ट हमारी टीम खेली है । उनमें हमें किसी में भी जीत नहीं मिल पाई थी । एम ए का पहला बैच २००३ में आया और २००३-४ के टूर्नामेण्ट में हमारी टीम पहली बार खेली थी । उसके अगले वर्ष २००४-५ में (जो हमारे बैच का पहला सत्र था) इस केन्द्र की टीम ने भाषा संस्थान (एस एल) से ड्रॉ खेला था । यही अब तक का सर्वश्रेष्ठ रिकॉर्ड था । उस बार हमारी टीम ने १३४ रन बनाए थे । इस जीत को दर्ज करके हमारे जीतने की शुरुआत हुई है । यद्यपि सेमीफाइनल में हम नहीं पहुँच पाए हैं पर आगे यह जीत का सिलसिला जारी रखने के लिए आप सभी की शुभकामनाएँ हमारे साथ हैं ।
Wednesday, January 9, 2008
गुफान्वेषणक्रमे प्रथमकन्दराप्राप्तिः
वयं कन्दरान्वेषणोत्सुकाः जनैः जनैः पृष्टवन्तः कुत्र कन्दराः, कुतः केन, मार्गेण, कस्यां दिशि ताः प्राप्तव्याः इति, क्वचित् क्वचित् उत्तरं प्राप्यते स्म । कतिपयदिनेषु यावत् न कोऽपि प्राप्तः यः कथयेत् यत् अहं तत्र गतवान्, तासां मार्गं जानामि इत्यादिः । कोऽपि कथयेत् संस्कृतकेन्द्रस्ये पश्च ताः सन्ति, कोऽपि कथयेत् अकादमिक-स्टॉफकालेजस्य पार्श्वात् मार्गः गच्छति । २००४ ईसवीयसत्रस्य समाप्तौ लखनऊविश्वविद्यालयस्य द्वौ सहपाठिनौ अस्माकं पार्श्वे आयातौ । एकदा तौ द्वौ- विवेकः हनुमानप्रसादपाण्डेयः च, सुरजीतः अहं च निश्चयं कृत्वा दक्षिणवने कन्दरान्वेषणाय प्रस्थिताः । तत्र गच्छन्तः वयं विशालाः विशालाः शिलाः दृष्ट्वा तत्र गुफा सम्भवति इति अनुमीय अनुमीय अत्र तत्र अपश्याम । एकत्र गत्वा लघुकूपाकारः गह्वरः प्राप्तः । मम तु प्रसन्नता आशा च अत्यधिकं वर्द्धिता । तं लघुगह्वरं दृष्ट्वा हनुमानप्रसादः उपेक्षता अवदत् "ई गुफा ह ?" तस्य उपेक्षा मां न अरुचत् । मन्ये अत्र अजन्ता-एलोरा इव विशालाः कन्दराः न सन्ति, कथं कोऽपि मम विश्वविद्यालयस्य लघुकन्दरान् उपेक्ष्यति ? विवेकः अरुचिं स्रस्तं चानुभवति स्म । तदा तत्र त्रयः लघुबालकाः वने एव आमोदं कुर्वन् तत्र आगताः । ते अबोधयन् यत् अत्र कन्दराः सन्ति याः कक्षपरिमाणा अपि सन्ति । तेषां वचनं श्रुत्वा हनुमानप्रसादः विश्वासमकरोत् यत् अत्र सत्यमेव कन्दराः सन्ति । ते बालकाः तत्र समीपमेव एकां कन्दरां अस्मान् प्रादर्शयन् तस्यां प्राविशन् च । विवेकस्य अरुचिं दृष्ट्वा अन्यस्मिन् दिने विस्तरेण गुफान्वेषणं करिष्याम इति निश्चीय वयं न्यवर्तयम् ।
अन्यस्मिन् दिने किं अभवत्......... अग्रे कथयिष्यामः........नमस्कारः.......
अन्यस्मिन् दिने किं अभवत्......... अग्रे कथयिष्यामः........नमस्कारः.......
Thursday, December 6, 2007
आरण्यकाः छात्राः कन्दराः प्रति प्रवृत्ताः (गुहान्वेषणम)
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालये ५ दिसम्बरे मानसूनसत्रः समाप्तः । अधुना त्रिवर्षपूर्वस्य स्मृतिः मम मनसि जागरति यदा मम अपि अत्र प्रथमः वर्ष आसीत् ।
अहं स्नातकोत्तरकक्षायां पठितुं २००४ क्रिष्टाब्दे अत्र आगच्छम् । मम प्रथम सत्रः (मानसून २००४) यदा समाप्तप्रायः आसीत्, आस्माभिः श्रुतं यत् विश्वविद्यालयेऽस्मिन् कन्दराः सन्ति । कुत्र सन्ति, अस्य पर्याप्ता सूचना नासीत् । ततः किम्? अस्माभिः विनिश्चितं यत् ताः ढुण्ढिष्यामहे (ढुण्ढिधातुः वेदे अन्वेषणार्थे प्रयुक्तः अस्ति) । तासां विषये केवलमिदं श्रुतमासीत् यत् ताः दक्षिणीये वने सन्ति । अनेकैः पृष्टम्, परं कोऽपि एतावत् न प्राप्तः यः कथयेत् यत् अहं तत्र गतः अस्मि, परं किञ्चित् किञ्चित् सूचना क्रमेण प्राप्ता जाता । यदा केवलं एतावद् एवे निश्चितमासीत् यत् कन्दराः सन्ति, एकस्मिन् रात्रौ, प्रायः एकादश वादने, वयं केचिज्जनाः स्व केन्द्रे (विशिष्ट संस्कृत अध्ययन केन्द्रे) संगणकीये परियोजनाकार्ये संलग्ना आस्म, रवीशः, एकः अन्यः अहं च सुरक्षाकर्मिणा प्रकाशनी (टॉर्च) आदाय अनुमानस्यैव आधारेण कन्दराः अन्वेष्टुं एकत्रस्थानतः वने प्रविष्टाः । सार्धं होरापर्यन्तं वयं तत्र अभ्रमन्, "अत्र विशालाः शिलाः सन्ति- अत्र कन्दरा सम्भवति", "अत्र गहने स्थाने सम्भवति" इत्यादीनि अनुमानानि कुर्वन् । चन्द्रिकामयी रात्रिरासीत् कन्दराः न प्राप्ताः परम् आनन्दः तु प्राप्तः । तद्रात्रौ वयं न्यवर्तयाम, अनेन निश्चयेन सह यत्, न अधुना, कदापि तु कन्दराः प्राप्स्यन्ते एव अस्माभिः । ततः निवृत्य, केन्द्रे आगत्य वयं आरण्यकम् अनुभवम् तत्र सहपाठिनः अश्रावयाम ।
अन्यस्मिन् दिने किं अभवत्......... अग्रे कथयिष्यामः........नमस्कारः
अहं स्नातकोत्तरकक्षायां पठितुं २००४ क्रिष्टाब्दे अत्र आगच्छम् । मम प्रथम सत्रः (मानसून २००४) यदा समाप्तप्रायः आसीत्, आस्माभिः श्रुतं यत् विश्वविद्यालयेऽस्मिन् कन्दराः सन्ति । कुत्र सन्ति, अस्य पर्याप्ता सूचना नासीत् । ततः किम्? अस्माभिः विनिश्चितं यत् ताः ढुण्ढिष्यामहे (ढुण्ढिधातुः वेदे अन्वेषणार्थे प्रयुक्तः अस्ति) । तासां विषये केवलमिदं श्रुतमासीत् यत् ताः दक्षिणीये वने सन्ति । अनेकैः पृष्टम्, परं कोऽपि एतावत् न प्राप्तः यः कथयेत् यत् अहं तत्र गतः अस्मि, परं किञ्चित् किञ्चित् सूचना क्रमेण प्राप्ता जाता । यदा केवलं एतावद् एवे निश्चितमासीत् यत् कन्दराः सन्ति, एकस्मिन् रात्रौ, प्रायः एकादश वादने, वयं केचिज्जनाः स्व केन्द्रे (विशिष्ट संस्कृत अध्ययन केन्द्रे) संगणकीये परियोजनाकार्ये संलग्ना आस्म, रवीशः, एकः अन्यः अहं च सुरक्षाकर्मिणा प्रकाशनी (टॉर्च) आदाय अनुमानस्यैव आधारेण कन्दराः अन्वेष्टुं एकत्रस्थानतः वने प्रविष्टाः । सार्धं होरापर्यन्तं वयं तत्र अभ्रमन्, "अत्र विशालाः शिलाः सन्ति- अत्र कन्दरा सम्भवति", "अत्र गहने स्थाने सम्भवति" इत्यादीनि अनुमानानि कुर्वन् । चन्द्रिकामयी रात्रिरासीत् कन्दराः न प्राप्ताः परम् आनन्दः तु प्राप्तः । तद्रात्रौ वयं न्यवर्तयाम, अनेन निश्चयेन सह यत्, न अधुना, कदापि तु कन्दराः प्राप्स्यन्ते एव अस्माभिः । ततः निवृत्य, केन्द्रे आगत्य वयं आरण्यकम् अनुभवम् तत्र सहपाठिनः अश्रावयाम ।
अन्यस्मिन् दिने किं अभवत्......... अग्रे कथयिष्यामः........नमस्कारः
Sunday, November 18, 2007
वन्दे मातरम्
रामचरितमानस- सुन्दरकाण्ड मङ्गलाचरण
जय श्री राम
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम् ॥
नान्यास्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा ।
भक्तिं प्रयच्छ रभुपुङ्गवनिर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम् ॥

नान्यास्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा ।
भक्तिं प्रयच्छ रभुपुङ्गवनिर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥
संस्कृते नवलेखनम्

लिखने वाले लिखते रहते हैं और पढ़ने वालों का इन्तज़ार नहीं करते । परन्तु इस बात से प्रभावित तो अवश्य होते हैं कि उनकी लिखी बात कितनी पढ़ी जा रही है । कोई इसी आशा में लिखता जाता है कि आज मेरी रचना न भी पढ़ी जाए तो क्या हुआ "कालोऽनन्तः विपुला च पृथिवी, कोई न कोई कभी न कभी तो धरती पर आएगा जो मेरी प्रतिभा को पहचानेगा ।" परन्तु एक बात तो है कि लिखने वाले को कोई तो प्रेरक तत्त्व चाहिए ही । संस्कृत में लिखने वालों के साथ यही प्रेरक की कमी है । यद्यपि कुछ पुरस्कार प्रेरक तो बनते हैं पर सबसे अच्छा प्रेरक है रचना का पढ़ा जाना । संस्कृत के लघु रचनाकारों की बात प्रकाशित नहीं हो पाती है इससे वे नया-नया लिखने को प्रोत्साहित नहीं होते ।
पर आज हमारे पास इस समस्या से मुक्ति का उपाय है- इण्टरनेट प्रकाशन । अपने ब्लॉग पर अपनी छोटी-बड़ी बातें लिखिए, जितना हो सके उतना नया और रचनात्मक लिखिए, उन्हें ज्यादा नहीं तो आपके आस-पास के लोग तो पढ़ लेंगे । और अच्छा हो जब वे उस ब्लॉगपोस्ट पर टिप्पणी (Comment) भी दें । दूसरों की प्रतिक्रिया देखकर आपका उत्साह बढ़ेगा और आप और अच्छा लिखने के किए प्रेरित होंगे । इसमें एक फायदा भी है कि इसमें आपके आसपास के लोगों की ही प्रतिक्रियाएँ होंगी, उद्भट विद्वानों की नहीं जो कृति के स्तर पर सवाल उठाएँगे । वे आपके आस-पास के लगभग आप जैसे ही लोग होंगे । आप दूसरों से ऐसे प्रोत्साहन की अपेक्षा रखें उससे पहले आवश्यक है कि आप जिनका ब्लॉग पढ़ें, तो यदि कुछ कहने लायक लगे तो उसपर टिप्पणी अवश्य दें । यह आपकी काव्य प्रतिभा को भी निखारने में सहयोगी होगा ।
Wednesday, July 11, 2007
गिरितनया

गिरि को अचल कहें या अचला गिरिजा को
_____तप नहीं जिनका गिरीश भी डिगाए हैं
बरस करोड़ों बीते अनुभव मीठे-तीते
_____शीश गिरिराज निज आज भी उठाए हैं
गौरी खुद जगमाता हिमवान ताके तात
_____तभी देवतातमा कहत कालिदास हैं
काको कहौं दोनों हैं एक से बढ़कर एक
_____गिरि से हैं गौरी या गौरी से गिरिराज हैं
------ ------- ------- ---------- ------- सूर्यांशी
_____तप नहीं जिनका गिरीश भी डिगाए हैं
बरस करोड़ों बीते अनुभव मीठे-तीते
_____शीश गिरिराज निज आज भी उठाए हैं
गौरी खुद जगमाता हिमवान ताके तात
_____तभी देवतातमा कहत कालिदास हैं
काको कहौं दोनों हैं एक से बढ़कर एक
_____गिरि से हैं गौरी या गौरी से गिरिराज हैं
------ ------- ------- ---------- ------- सूर्यांशी
Tuesday, July 10, 2007
मेरा चित्र
अमल धवल गिरि के शिखरों पर .......... ...... ...... बादल को घिरते देखा है
this is the site of Gulmarg (KASHMIR) while tracking to touch the snow with two other people NARAYAN JI AND ADARSH SHUKLA (11 November 2006)

this is the site of Gulmarg (KASHMIR) while tracking to touch the snow with two other people NARAYAN JI AND ADARSH SHUKLA (11 November 2006)
साधना
सत्य है नित ही प्रगति हित है जरूरी साधना
रख तू अनुशासन स्वयं पर पर तू खुद को बांध ना
पथ पे कुछ बढ़ने से पहले मन को अपने दृढ़ करो
मन में जो हो साध ना तो क्या करेगी साधना ?
है नहीं पर्याय अनुशासन दमन का अपने ही
दमन ख़ुद का करके नष्ट करो न अपने सपने ही
भ्रम में हैं वे लोग जो यम-नियम को समझे दमन
दबने को वे नहीं कहते कहते बनने को सुजन -सूर्यांशी
श्रीगणेशाय नमः
ओ३म्
लम्बोदरं परमसुन्दरमेकदन्तम्
रक्ताम्बरं त्रिनयनं परमं पवित्रम्
उद्यद्दिवाकरनिभोज्ज्वलकान्तिकान्तम्
विघ्नेश्वरं सकलविघ्नहरं नमामि
लम्बोदरं परमसुन्दरमेकदन्तम्
रक्ताम्बरं त्रिनयनं परमं पवित्रम्
उद्यद्दिवाकरनिभोज्ज्वलकान्तिकान्तम्
विघ्नेश्वरं सकलविघ्नहरं नमामि
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